गाँव के बाहर एक पुराना बर गछ का पेड़ था।
लोग कहते थे कि ये तो बस एक पेड़ है...
लेकिन गाँव के बुजुर्ग जानते थे कि यह जीवंत यादों का घर है।
एक माँ हर शाम उस पेड़ के नीचे बैठती थी।
उसका बेटा शहर गया था,
और कभी वापस नहीं लौटा।
हर दिन माँ पेड़ से कहती,
"बेटे, अगर तुम ज़िंदा हो,
तो हवा बनकर लौट आना..."
और अजीब बात यह थी...
उस समय, हवा ज़रूर चलती थी।
पते याँ हिलती थीं,
जैसे कोई हाथ हिला रहा हो।
गाँव वाले हँसे,
"बुढ़िया पागल हो गई है।"
लेकिन एक दिन, बिजली गिरने ही वाली थी।
पूरा गाँव सो रहा था।
तभी बर गच के पेड़ ने अपनी पत्तियों को इतनी ज़ोर से हिलाया
कि लोग जाग गए।
सब लोग बाहर भागे
और देखा—
बिजली माँ के घर पर गिरने ही वाली थी।
सब लोग बच गए।
अगली सुबह,
बरगद का पेड़ आधा जल चुका था...
लेकिन माँ का घर सुरक्षित था।
माँ ने पेड़ को गले लगाया और रोने लगी।
उस दिन गाँव को समझ आया—
कुछ पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होते,
कुछ पेड़ दुआ बन जाते हैं।

Yeh tasveer prakriti aur roshni ke beech ka ek silent dialogue hai.
Jahan pani aaine ki tarah aasman ko dekhta hai,
aur ek chhoti si roshni poore andhere ko zinda kar deti hai.
Yeh sirf ek landscape nahi —
yeh ek ehsaas hai… sukoon ka, akelapan ka, aur umeed ka.”
Yeh tasveer ek khamosh kahani hai…
jaise aasman ne zameen par apna dil rakh diya ho.
Neele–hara aasman, badalon ki halki lakeeren,
aur beech me chamakta woh peela water tank —
bilkul ek lighthouse ki tarah,
jo jungle aur paani ke beech khada,
andhere ko raasta dikha raha hai.
Neeche shaant pani uska aks sambhaal ke baitha hai,
jaise keh raha ho —
“Jo upar hai, wahi andar bhi hai.”
Is scene me ek ajeeb si sukoon wali udaasi hai.
Na shor, na bheed…
sirf hawa, pani, ped aur roshni.
Aisa lagta hai jaise waqt ne yahan ruk kar
ek gehri saans le li ho.



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